The Ego Trick Complete Book Summary In Hindi

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The Ego Trick About Book

The Ego Trick Book दो लफ्जों में

इस किताब का टॉपिक है , ‘ मैं या मेरे बारे में ‘ । इस समरी में हम माइंड के काम करने के तरीके और उसकी कमियां , सोसाइटी , कल्चर , टेक्नोलॉजी में बदलाव , के साथ – साथ अपनी पहचान , आत्मा और फैसला लेने की आजादी जैसे महत्वपूर्ण फिलोसॉफिकल फैक्टर्स के सवालों को परख कर अपने एहसास को एक शेप देने के की कोशिश करेंगे ।

यह किताब किनको पढ़नी चाहिए

– जिन्हें लगता है कि यह दुनिया एक भ्रम है ।

– माइंड की फिलासफी के बारे में जानने के इच्छुक स्टूडेंट ।

– वेस्टर्न और बुद्धिस्ट फिलासफी में एक साथ इंटरेस्ट लेने वाले ।

The Ego Trick Book के लेखक के बारे में

जूलियन ब्रग्गिन एक ब्रिटिश फिलोसोफर हैं और ‘ फिलॉस्फर्स मैगजीन ‘ के फाउंडर हैं । वह बहुत सारे बेस्ट सेलिंग फिलोसोफिकल टेक्स्ट के लेखक भी हैं ।


क्या स्पिरिचुअल एहसासों को ट्रेन कर के हम अपने वजूद की सच्चाई के बारे में पता लगा सकते हैं ? या फिर वह हमारी किसी दिमागी कमजोरी का नतीजा है ?


इस समय इस समरी को कौन पढ़ रहा है ? बेशक वह आप ही हैं ! लेकिन वाकई में आप कौन हैं ? क्या आप वह स्कूल हैं जहां जा चुके हैं ?, या आप ही अपने पेरेंट्स है ? , या फिर आप वह जॉब हैं जो इस समय आपके पास है ?

क्या आप अब भी वही पर्सन हैं जो 3 साल की एज में थे ? क्या यह आपके अंदर से आने वाली आवाज है या फिर यह कोई मल्टीप्ल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है , जिसकी वजह से आप ऐसी अलग अलग तरह की पर्सनालिटीज को खुद में महसूस कर रहे हैं ?

आखिर कैसे पता चलेगा कि आप वाकई में कौन हैं ? या फिर वह क्या चीज है जो आपकी पर्सनालिटी को बनाती है ? फिलॉस्फर्स , साइंटिस्ट और धार्मिक गुरु इन सवालों का जवाब सदियों से तलाश कर ने की कोशिश कर रहे हैं ।

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यह लेसंस इस बात का दावा नही करते हैं कि उनके पास सारे जवाब हैं लेकिन हम यह जानेंगे कि सारे जवाब तो किसी के पास भी नहीं है ।

इसके अलावा आप जानेंगे कि आपके पास एक आत्मा के होने की संभावना है , मल्टीप्ल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर की कॉमन वजह क्या है ? और आपकी खुद की फ्री विल क्यों नहीं हो सकती है ?

सन 1982 में सुजैन सीगल नाम की एक औरत पेरिस में बस का इंतजार कर रही थी । और फिर वह अचानक से अपनी जिंदगी के बारे में सब कुछ भूलने के बाद यह भी भूल गई कि वह कौन थी ? सीगल को यह लगने लगा था की जो बॉडी और ब्रेन जन्म से उसके पास थे , अब उसके नहीं रह गए थे ।

वह अपने चारों तरफ की चीजों और लोगों को अपना ही एक हिस्सा मानने लगी थी । उसने सोचा कि वह एक विशाल खाली जगह के सिवा कुछ नहीं थी । और सीगल को यकीन हो गया कि वाकई में उसका कोई वजूद नही था । आइंदा 10 सालों तक वह अपने इस नुकसान को झेलती रही और बहुत से थेरेपिस्ट्स से मदद मांगती रही ।

लेकिन वह खुद को अपनी पुरानी वाली सीगल से कनेक्ट नहीं कर पाई । फिर वह इस बात पर आश्चर्य करने लगी कि कहीं उसे सेल्फ अवेकनिंग तो नहीं हो गई थी ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि वह अपनी पहचान को खोकर एक ज्यादा बेहतर फॉर्म में आ गई थी ? अपने एक्सपीरियंस और एक काल्पनिक बुद्धिस्ट कंसेप्ट ‘ अनत्ता ‘ यानी ‘ नो सेल्फ जिसमें कोई वजूद बाकी नहीं रहता है , की सिमिलरिटी को देखते हुए , उसने एक स्पिरिचुअल गुरु की तरह से काम करना शुरू कर दिया ।

आखिर 1996 आते आते सीगल के ‘ अनत्ता वाले एहसास टूट कर बिखरने लगे । वह खुद को पुरानी वाली सीगल समझने लगी । और उसके स्पिरिचुअल मेसेजस में कन्फ्यूजन पैदा होने लगा । न्यूरोसाइंस इस बात की तरफ इशारा करता है कि वास्तव में कुछ स्पिरिचुअल एहसास हमारी दिमागी कमजोरी की वजह से पैदा होते हैं ।

बदकिस्मती से सीगल का केस भी ऐसा ही था , जो ना तो अपने हाथों में पेन को पकड़ सकती थी और ना ही उसे लोगों के नाम याद थे । फेब्रुअरी 1997 में उसके अंदर एक बड़ा ब्रेन ट्यूमर डायग्नोज किया गया और फिर वह कोमा में चली गई । उसके कुछ महीनों बाद ही उसकी मौत हो गई ।

सन 1882 में सीगल के एहसासों में जो बदलाव हुए थे , डॉक्टर्स का मानना था कि वह उसके दिमाग पर ट्यूमर के प्रेशर की वजह से हुए थे । हालांकि सीगल के फॉलोअर्स इस बात को नहीं मानते थे । उनका यह मानना था कि ट्यूमर की वजह से ही सीगल का कनेक्शन खुद को ही पूरा यूनिवर्स समझ लेने वाले उसके सबसे बढ़िया यूनिवर्सल कॉन्शसनेस से टूट गया था ।


आत्मा जैसी किसी चीज का होना हमारी अंदरूनी सोच का नतीजा है लेकिन यह कोई लॉजिकल चीज नहीं है ।


करीब करीब सभी धर्मों का यह मानना है की सभी इंसानों में एक कभी ना मरने वाली आत्मा मौजूद है । सदियों पहले के फिलॉस्फर्स को भी आत्मा के अजर अमर होने और शरीर की मौत हो जाने का आइडिया बहुत पसंद था ।

पर्शियन फिलॉस्फर अवसिन्ना ने आत्मा की सच्चाई का पता लगाने के लिए एक ‘ फ्लोटिंग मैन ‘ नाम का थॉट एक्सपेरिमेंट बनाया । उसने लोगों को यह इमैजिन करने के लिए कहा कि वह लोग बिना किसी बॉडी के और दुनिया के एहसासों को बिल्कुल भी महसूस किए बगैर हवा में तैर रहे हैं ।

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क्या ऐसी सिचुएशन में भी हम अपनी मौजूदगी के बारे में सोच समझ सकते हैं ? अगर हमारी अंदरूनी समझ इसका जवाब हां में देती है , तो थॉट एक्सपेरिमेंट यह बताता है की बॉडी के एहसासों और ब्रेन के रिस्पांस से अलग हमारे वजूद के किसी इंपॉर्टेट हिस्से में कोई दूसरी चीज भी मौजूद है ।

लेकिन क्या इससे कोई लॉजिकल नतीजा भी निकलता है ? पूरी तरह से तो नहीं , हालांकि अवसिन्ना का थॉट एक्सपेरिमेंट हमें एक सही दिशा दिखाता हुआ तो लगता है मगर इसमें कुछ गड़बड़ियां भी हैं । यह एक्सरसाइज इस बात का यकीन दिलाती है की हम खुद को बिना बॉडी के भी इमेजिन कर सकते हैं ।

लेकिन इससे हमें अपने अंदर बॉडी की समझ होने का पता नहीं चलता है । हमारे खयालों में तो बॉडी छुप जाती हैं मगर वह फिर भी मौजूद ही रहती है जो हमें अपनी आत्मा को अलग से इमेजिन करने के लिए अलाउ नहीं करती है ।

इसके अलावा कुछ चीजों के लिए हमारे एहसास का होना और कुछ के लिए ना होना हमें गुमराह कर सकता है । आखिरकार लोग साइको- ड्रग्स के इफेक्ट में आकर हर तरह के एहसासों को इमेजिन करने में कैपेबल हो जाते हैं ।

हालांकि बॉडी से अलग होकर आत्मा की महसूस करने की काबिलियत का जादू भी किसी ठोस सच्चाई को बयां नहीं करता है । डेसकार्टस का एक मशहूर दावा है , ” मैं सोचता हूं इसलिए मैं जिंदा हूं । ” – इस दावे में भी एक लॉजिकल मिस्टेक है ।

सिर्फ इस वजह से की इंसान सोच सकते हैं , यह मतलब नहीं निकाला जा सकता है कि बस इंसानों के पास ही एक सोचने वाला दिमाग हो सकता है । मल्टीप्ल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर हमारे एक्सपीरियंस की असली शक्ल दिखा देते हैं ।

एक बार की बात है किसी मिस्टीरियस महल में एक साथ 11 लोग रहा करते थे । इस तरह की बात हमें किसी परियों वाली कहानी की याद दिलाती है ।

लेकिन यह किसी मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर वाले इंसान के माइंड की सिमिलरिटी को भी दिखाती है । मल्टीप्ल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर इस बात को हाइ लाइट करता है कि हमारे एक्सपीरियंस दुनिया के बारे में कितने सब्जेक्टिव हैं । सब्जेक्टिव का मतलब इस बात से है की किसी चीज के लिए उस इंसान का क्या नजरिया है !

सन 1990 में रॉबर्ट ऑक्स नेम को मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के लिए डायग्नोज किया गया था । ऐसा लगता था जैसे बहुत सी अलग – अलग पर्सनालिटी अलग – अलग समय पर उसके दिमाग का इस्तेमाल कर रही थी ।

कभी – कभी ऑक्सनेम के अंदर मौजूद रहने वाली पर्सनालिटी का किरदार शैतान बॉबी होता था , जो प्रैक्टिकल जोक्स और रोलर स्केटिंग का बहुत शौकीन था । पर फिर कुछ पलों बाद ही उसका दिमाग टॉमी नाम के शख्स की तरफ मुड़ जाता था ।

जो एक गर्म दिमाग और जल्दी ही गुस्से का शिकार हो जाने वाला आदमी था । कुल मिला कर 11 पर्सनालिटीस उसके दिमाग का इस्तेमाल कर रही थीं ।

इस बीमारी का पता चलने से पहले ऑक्सनेम अपनी पढ़ाई के कैरियर में काफी सक्सेस फुल था । लेकिन सन 1990 में वह ज्यादा टाइम तक अपने दिमाग को सुन्न होता हुआ महसूस करने लगा । आखिर कार उसने इसका इलाज करना शुरू कर दिया ।

ऑक्स नेम के इलाज के दौरान उसके थैरेपिस्ट ने यह गौर किया की कैसे एक के बाद दूसरी पर्सनालिटी उसके दिमाग पर कब्जा कर लेती थी । 15 मिनट के लिए टॉमी की गुस्से वाली और बच्चों जैसी पर्सनैलिटी वहां पर मौजूद होती थी और फिर उसके बाद दूसरी पर्सनालिटी उसकी जगह ले लेती थीं ।

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जल्दी ही यह बात साफ हो गई , की ऑक्स नेम के दिमाग में रहने वाली डिफरेंट पर्सनालिटीस एक दूसरे के बारे में नहीं जानती थीं । वह जब भी कभी किसी दूसरी पर्सनालिटी की तरफ स्विच करता था तो वह पहले वाली पर्सनालिटी की बातों को भूल जाता था ।

ऑक्स नेम जैसे मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के केस अक्सर बचपन में हुई छेड़छाड़ की गलतियों की वजह से पैदा होते हैं ।

जब बच्चे किसी गहरी चोट को एक्सपीरियंस करते हैं फिर चाहे वह शारीरिक हो या सेक्सुअल हो या फिर इमोशनल ही क्यों ना हों , वह इस बात को समझने के लिए स्ट्रगल करते हैं कि उनके साथ क्या हो रहा था |

ऐसी सिचुएशन का मुकाबला करने के लिए उनका दिमाग अपने लिए एक नई खयाली दुनिया को बना लेता है , जहां पर वह खुद अपनी जगह किसी और शख्स को इसी तरह की चोट पहुंचता हुआ देखते है ऑक्स नेम के केस में चोट ज्यादा गहरी थी जिसकी वजह से उसने अपनी मदद के लिए 11 पर्सनालिटीसको तैयार कर लिया था ।

धीरे – धीरे लेकिन निश्चित तौर पर ऑक्स नेम अपनी बचपन की चोट को समझने लगा था और थेरेपी का इस्तेमाल करके उसने अपनी पर्सनालिटीस को कम कर दिया था । अब उसके पास बस तीन पर्सनैलिटी ही बाकी बची थीं ।


हमारे सेंस एक कल्चर से दूसरे कल्चर तक बदल ने के बावजूद हमारे बारे में सोसाइटी हिसाब से अपनी एक शेप ले लेते हैं ।


क्या आप कभी अपनी जिंदगी में इतने ज्यादा बिजी हुए हैं कि आप ने अपने इर्द – गिर्द की दुनिया में होने वाले किसी खास मौके को बिल्कुल ही मिस कर दिया हो ।

आपको खुद अपने बारे में समझने के लिए दुनिया के बारे में जानने के अलावा अपने अंदर से बाहर की तरफ भी देखना पड़ेगा । खुद के लिए हमारे होशो हवास हमेशा वैसी ही एक शेप ले लेते हैं , जैसा कि सोसाइटी हमें समझती है ।

इसलिए ट्रांसजेंडर्स की सोसाइटी में यह बहुत अहम माना जाता है कि वह अपने जैसे दूसरे ट्रांसजेंडर लोगों को भी उसी तरह से समझें , जैसा कि वह खुद अपने बारे में समझते हैं।

जो किसी भी जेंडर कैटेगरी को बिलॉन्ग करने वाले शख्स की अपनी पहचान होती है । सोसाइटी का वेरीफिकेशन और मंजूरी खुद की एक मजबूत और टिकाऊ सेंस के लिए बहुत जरूरी होती है ।

जरा ड्रयू मारलैंड की कहानी पर गौर कीजिए , जिसने 43 साल की उम्र में खुद को आदमी से औरत में कन्वर्ट करवा लिया था । वह इस बात पर जोर देती है कि उसके लिए एक औरत बन जाना कितना जरूरी था । वरना उसके आस पास के लोग आइंदा भी उसको एक मर्द की तरह से ट्रीट करते रहने वाले थे ।

मारलैंड को अपनी अधेड़ उम्र में कन्वर्ट होने के बाद , दूसरी बहुत सी ट्रांस्वूमेन के जैसा ही एक्सपीरियंस हुआ था ।

उसने देखा की जब तक वह खुद को दुनिया के सामने एक आदमी के तौर पर पेश करती रही , तब तक अक्सर उसे बड़ी चालाकी से पूरी तरह नजरअंदाज करके उसकी बेज्जती की जाती रही । इस वजह से उसका कॉन्फिडेंस कम होने लगा था ।

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अलग – अलग कल्चर हमारी सेंस को अलग – अलग तरह की शेप देते हैं । फिलोसोफर रोम हरे के मुताबिक कुछ लोगों में खुद का सेन्स बहुत कम होता है ।

उनके इमोशंस को जाहिर करने का तरीका उसी तरह से होता है जिस तरह से वह अपने आसपास रहने वाले लोगों से जुड़े हुए होते हैं । अगर उनकी कम्युनिटी में रहने वाले लोग दुखी होंगे , तो वह भी दुखी हो जाएंगे ।

अगर उनकी कम्युनिटी खुश होगी तो वह भी खुश होंगे । इसी तरह से उनके फैसले भी फैमिली या खानदान के नजरिए से लिए जाते हैं ना कि उनके खुद की मर्जी से ।

इगो की मौजूदगी दिमाग की एक चाल है । इंसान के तौर पर हम अपनी मौत से बहुत डरते हैं ।

मौत हम पर उस पेचीदा पहचान के खत्म हो जाने का जुर्माना लगा देती है , जिस पहचान के हम मालिक होते हैं । लेकिन अगर यह सब आईडेंटिटीज एक भ्रम हो तो ? सच्चाई यही है कि इगो दिमाग की एक ट्रिक है ।

18 वीं सेंचुरी में फिलोसोफर डेविड ह्यूम ने 1 आइडिया डिवेलप किया कि इगो एक कहीं पर भी ना टिकने वाली हस्ती है ।

हमारा दिमाग आराम से एक जगह टिके रहने की जगह हमेशा उसमें आते जाते रहने वाले आइडियाज थॉट्स और इमोशन का कंबीनेशन बनाता रहता है ।

अपनी इस थ्योरी को टेस्ट करने के लिए डेविड ह्यूम ने देखा कि उसके सेंस हमेशा फीलिंग और इमोशन के मामले में उभर कर सामने आ जाते थे ।

जैसे कि – ठंडक , गर्मी , रोशनी , अंधेरा , डर , खुशी , प्यार और नफरत वगैरह । ह्यूम ने रियलाइज किया कि वह इन तरीकों के अलावा किसी और तरीके से खुद को महसूस करने के लायक नहीं था ।

इस वजह से उसने यह नतीजा निकाला की ‘ सेल्फ ‘ जैसी कोई चीज नहीं होती है । एक्सपीरियंस और इमोशन के लंबे सिलसिले के बाद एहसासों से जुड़ी हुई एक गलतफहर्म की सिचुएशन दिखाई देने लगती है । हालांकि यह भ्रम जल्दी ही टूट भी जाता है ।

इगो की ट्रिक में , वक्ती तौर पर और लापरवाही के साथ बनाए गए नजरिए में से बाहर निकाल कर एक आइडेंटिटी के सेन्स का बनाया जाना भी शामिल है ।

माइंड के बाहर ‘ सेल्फ ‘ नाम की चीज हमेशा हम को खारिज कर सकती है । जैसे कोई अकेला आदमी एक ही समय में शिकारी और शिकार दोनों नहीं हो सकता है ।

वैसे ही किसी शख्स के लिए उसके खुद के एहसासों को ऑब्जर्व करना बिल्कुल नामुमकिन है । यह खुद की आंखों के अंदर देखने जैसा काम होगा ।


‘ सेल्फ ‘ के होने के बारे में गलतफहमी , ना सिर्फ वेस्टर्न फिलासफी में है बल्कि वह बुद्धिस्ट शिक्षाओं में भी दिखाई पड़ती है ।


हालांकि ‘ सेल्फ ‘ का आईडिया वेस्टर्न फिलासफी में अभी जरा नया नया बना है लेकिन यह सदियों से दुनिया के दूसरे धर्मों में बहुत इंपॉर्टेट माना जाता रहा है । सदियों पुरानी बुद्धिस्ट विजडम यह सिखाती है कि ‘ सेल्फ ‘ एक भ्रम की सिचुएशन है ।

शुरू मे में हमें अनत्ता या ‘ नो सेल्फ ‘ की धारणा से परिचित करा दिया गया है । अभी हाल ही में पुरानी बुद्धिस्ट किताबों की दोबारा से की गई जांच पड़ताल यह बताती है की ‘ नो सेल्फ ” , ‘ अनाट्टा का ज्यादा एक्यूरेट ट्रांसलेशन हो सकता है । ‘ नो सेल्फ ‘ का मतलब यह है कि कहीं पर भी कोई नहीं है । और पूरा यूनिवर्स ही एक भ्रम है ।

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दूसरी तरफ ‘ नॉन सेल्फ सिर्फ यह इशारा करता है कि खुद के कॉमन नजरियों को नकार देना चाहिए । बुद्धिस्ट सोच हिंदुओं के भगवान ब्रह्मा से मोटिवेटेड है , जिनके अंदर ‘ टू सेल्फ ‘ मौजूद है । ‘ नॉन सेल्फ ‘ बॉडी माइंड और सभी आने – जाने वाली टेंपरेरी सोचों और एक्सपीरियंस के मालिक किसी शख्स की एक पहचान है ।

बुद्धिस्म में नॉनसेल्फ का इंटरप्रिटेशन अलग – अलग तरीकों से किया गया है । कुछ बुद्धिस्म सोच वाले स्कूल यह बहस करते हैं , कि जब बुद्धा ने ‘ नॉनसेल्फ ‘ कहा तो उसका मतलब यह बताने से था कि हमारे अंदर पवित्र ब्रह्मा के एहसास की मौजूदगी ना होकर उसकी जगह ढेर सारी टेंपरेरी और दर्दनाक सोचें और एक्सपीरियंस ही मौजूद थे ।

इस प्रैक्टिकल नजरिए की वजह से यह पता चलता है की ‘ सेल्फ ‘ शब्द का का मतलब वही है , जिसे हम लोग खुद के बारे में बताने के लिए इस्तेमाल करते हैं ।

पहली नजर में यह एक आसान इंटरप्रिटेशन नजर आने के साथ साथ थोड़ा मायूस भी करता है । लेकिन यह इस बारे में भी बताता है कि ‘ सेल्फ ‘ एक पहले से तय की गई कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक बार मिलने के बाद तमाम उम्र अपने साथ चिपका कर रखा जा सकता हो ।

इसकी जगह ‘ सेल्फ ‘ एक ऐसी चीज है , जो हम जिंदा रह कर , अपनी हरकतों से , और अपनी चॉइस मेकिंग की वजह से बन जाते हैं । अगर हमारे पास आत्मा ना हो तो फिर हमारी खुद की इच्छा भी नहीं होगी ।

यह आइडिया कि हम अपनी मर्जी का कोई डिसीजन न ले पाएं , चाहे वह आइसक्रीम के फ्लेवर के बारे में हो या फिर कैरियर की चॉइस के बारे में हो , जितना आरामदायक लगता है उतना ही भयानक भी है । अगर हमारी कोई भी चॉइस मायने ना रखे , तो राइट चॉइस को चुनने की हमारी फिक्र भी खत्म हो जाएगी ।

और दूसरी तरफ ऐसा आईडिया हमारी जिंदगी को बे मकसद और खाली बना देता है । आप इंसानों की फ्री विल को मजबूती देने वाले आइडिया पर बिलीव करें की ना करें , यह इस बात पर डिपेंड करता है कि आत्मा की कौन सी थ्योरी आपको ऐसा करने पर सबसे ज्यादा मजबूर करती है ।

अगर आप इस वजह को मान लेते हैं कि ‘ सेल्फ ‘ आपके डिसीजन और एक्शन के साथ ढेर सारी टेंपरेरी सोच और एक्सपीरियंस के अलावा , और कुछ भी नहीं है , जो कि सिर्फ आपकी बॉडी और ब्रेन का एक मैकेनिकल आउटकम है , जो सिलसिलेवार फिजिकल लॉज़ की वजह से एनवायरमेंटल चेंजेस के साथ आता है तो फिर आपको फ्रीविल की मौजूदगी से भी इनकार करना पड़ेगा ।

फ्रीविल के बिना जिंदगी का आईडिया एक ऐसी चीज है जिस से हम बड़ी आसानी से डिसएग्री हो जाते हैं । जब हम एक कप चाय का आर्डर करते हैं , तो हम सोचते हैं कि इसकी जगह हम कॉफी का ऑर्डर भी बड़ी आसानी से कर सकते थे ।

लेकिन यह सच नही है । ऐसा आपकी जिंदगी के तजुर्बे , उस वक्त के हालात और उसमें शामिल खास फीलिंगस की वजह से हो सकता है । उस समय चाय को चूज करना टाला नहीं जा सकता था ।

ऐसा भी कोई जरूरी नहीं है , कि आपकी चॉइस उम्मीद के मुताबिक ही होगी । अपने होश वाले या फिर बिना होश वाले बहुत सारे फैक्टर्स के साथ हम अपने डिसीजन को एक फाइनल शेप देते हैं । हमें आखिरी पल तक यह पता नहीं होता है कि आखिर हमारी चॉइस कौन सी होगी ? यह भी मौसम की तरह का ही एक पेचीदा सिस्टम है ।

जिसमें यह बताना बहुत मुश्किल होता है कि अगले 3 हफ्तों में बारिश होगी या फिर धूप खिली रहेगी । इसके बारे मे प्रिडिक्ट ना कर पाने की सच्चाई का यह मतलब नहीं है , कि बादलों के पास कोई फ्री विल है । इसलिए वह अपनी खुशी से जहां चाहे वहां पर बारिश कर सकते हैं ।


टेक्नोलॉजिकल और कल्चरल चेंजस की वजह से हमारे सेंसस की फॉर्म बदल जा रही है ।


बहुत सी वजह से साइंस की कहानी लिखने वाले लेखक फ्यूचर के बारे में उदाहरण देकर समझाने की कोशिश नहीं करते हैं ।

उनकी मंशा मौजूदा वक्त के हालात पर सही बात करने की होती है क्योंकि हमारी दुनिया चेंजस होने की वजह से वह बहुत कम पहले जैसी दिखाई पड़ती है ।

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आज का ‘ सेल्फ ‘ पहले वाले ‘ सेल्फ ‘ से बहुत अलग है । आजकल की सोसाइटी यूनाइटेड होकर मजबूती से जुड़े रहने की पहचान के सेंस से अलग हटकर मल्टीप्ल आइडेंटिटी के सेट की तरफ आगे बढ़ रही हैं ।

बच्चों की जिंदगियों में पहले के मुकाबले जरा ज्यादा कांस्टेंट और यूनीफॉर्म एक्सपीरियंस का सिलसिला शामिल हो गया है ।

जो उन्हें एक ट्रेडिशनल पर्सनालिटी को डिवेलप करने के साथ कुछ खास तरह की कल्चरल एक्टिविटीज की तरफ ले जा रहा है ।

पिछले 20 सालों में दुनिया के आपस में लगाव का एक्सपीरियंस इंटरनेट और ग्लोबलाइजेशन के जरिए से दोबारा लिखा गया है ।

दुनिया भर के बच्चे रोजाना सैकड़ों की तादाद में अलग – अलग तरह के लोगों , उनके कल्चर और आइडियाज से कांटेक्ट कर रहे हैं ।

आपस में बातचीत करके और इंटरनेशनल इंफॉर्मेशन को शेयर करके उनकी पर्सनालिटी का एक नया पहलू निकल कर सामने आ रहा है ।

यहीं पर बात खत्म नहीं होती है । – आइंदा सालों में ‘ सेल्फ ‘ के हमारे नजरिए में बदलाव अभी और भी गर्म मिजाज होने वाले हैं । जैसा कि न्यूरोसाइंटिस्ट सूजन ग्रीनफील्ड ने उदाहरण के साथ समझाया है , मीडिया का यंग और डेवलपिंग माइंड्स पर बहुत ज्यादा असर पड़ता है ।

ग्रीन फील्ड के मुताबिक इंसानों के पास खुद को एक ग्रुप के पार्ट के शख्स की तरह से समझने की काबलियत के अलावा ‘ नो बडी ‘ एक ‘ नो बडी ‘ ही होता है की समझ भी होती है ।

मिसाल के तौर पर जब हम डांसिंग के लिए बाहर जाते हैं और वहां पर म्यूजिक में खो जाते हैं या फिर किसी पसंदीदा टीवी सीरियल को देखने में तल्लीन हो जाते हैं , तो खतरा इस बात का जाता है कि हम अपने आपको जरूरत है ज्यादा टाइम तक मल्टीमीडिया से इंगेज कर लेते हैं । तो खुद को ‘ नोबडी ‘ बना लेते हैं । ऐसे समय में हम अपनी पर्सनालिटी और ग्रुप आईडेंटिटी को खो देते हैं ।


The EgoTrick Book Summary Conclusion कुल मिलाकर


हालांकि आप खुद के बारे में महसूस कर सकते हैं कि , ” आप कौन है ” । न्यूरोसाइंस , साइकोलॉजी , सोशियोलॉजी , रिलीजन और फिलॉसफी । इन सब की नजर इस आईडिया के लिए एक मजबूत केस को बनाती है की ‘ सेल्फ ‘ एक ऐसी गलतफहमी की सिचुएशन है , जो हमारे आते जाते रहने वाले थॉट्स , इमोशंस और एक्सपेरिएंसेस को आपस में जोड़ कर रखता है ।

अपने आप को एक्सप्रेस कीजिए |

चाहे मेडिटेशन के जरिए से या फिर फिलोसॉफिकल इंट्रोस्पेक्शन से , इन लेसंस में दिए गए आईडियाज को अपने माइंड पर टेस्ट करने के लिए थोड़ा समय जरूर निकालिए ।

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सीखने से लेकर याद करने तक के वह तरीके जिन से हम अपनी नॉलेज में आए बिना ही अपनी आईडेंटिटीज को बना लेते हैं , हमें ज्यादा सेल्फ – अवेयरनेस के मुकाम तक पहुंचा देते हैं । और हमें अपने रेस्ट्रिक्टिव आइडियाज : – ‘ हम कौन हैं और ‘ हम कैसा बन सकते हैं ‘ से फ्री भी कर सकते हैं ।

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